संजीवनी

मधुमेह (डायबिटीज) पर नियंत्रण रखने के उपाये

मधुमेह होने पर कुछ स्वास्थ्य समस्याएं उठ खड़ी होती हैं। इन समस्याओं का उचित समाधान कर मधुमेह रोग पर नियन्त्रण करने के लिए, कुछ सावधानियां रखना जरूरी और हितकारी होता है।
रक्त में शर्करा बढ़ जाने को मधुमेह रोग होना कहते हैं। इस पर नियन्त्रण करना अत्यन्त आवश्यक होता है क्योंकि यदि नियन्त्रण न किया जाए तो हमारे शरीर और स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएं पैदा हो सकती हैं यह दो प्रकार की हैं -

रक्त शर्करा की मात्रा अचानक कम हो जाना
रक्त शर्करा की मात्रा बहुत बढ़ जाना।
(1) रक्त शर्करा की कमी-
मधुमेह के रोगी के शरीर में, कभी कभी, रक्त शर्करा की मात्रा अचानक कम हो जाती है। ऐसा तब होता है जब मधुमेह नाशक दवाइयों का सेवन, अधिक मात्रा में किया गया हो, भोजन कम मात्रा में किया हो या उपवास किया हो, बहुत देर तक भारी श्रम या व्यायाम किया हो। रक्त शर्करा कम होने पर सिर में भारीपन व दर्द होना, अचानक पसीना, चक्कर घबराहट, थकावट, चेहरे का रंग उड़ जाना, खड़े न रह पाना आदि लक्षण प्रकट होते हैं जो रक्त शर्करा कम हो जाने की खबर देते हैं ऐसी स्थिति हो तो रोगी को मीठे फल का रस, मीठा पदार्थ या एक बड़ा चम्मच भर शक्कर तुरन्त खिला देना चाहिए अन्यथा रोगी मूच्र्छित हो जाएगा।

(2) रक्त शर्करा बढ़ जाना-
चिकित्सक के निर्देशों का ठीक से पालन न करने, नियमित रूप से दवाइयों का सेवन न करने और पथ्य‑अपथ्य आहार का पालन न करक बदपरहेजी करने आदि कारणों से रक्त शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। मानसिक तनाव और चिन्ता का दबाव भी एक कारण होता है। ऐसी स्थिति पर नियन्त्रण करना बहुत कठिन होता है और रोगी को अगर अन्य कोई बीमारी भी हो तो उसका इलाज भी ठीक से नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में दीर्घकालीन परेशानियां पैदा होने लगती हैं जिससे शरीर के अन्य अवयवों की कार्य प्रणाली पर बुरा प्रभाव पड़ने लगता है और स्नायविक‑तन्त्र, गुर्दे, हृदय, आखों तथा रक्त वाहिनियों से सम्बन्धित रोग और संक्रमण होना आदि स्थितियां निर्मित होने लगती हैं।
यह रोग हाथ व पैरों के स्नायुओं को क्षति पहुंचाता है जिससे हाथ पैरों में दर्द, खिंचाव, जलन और सुन्न पड़ना आदि लक्षण प्रकट होते हैं, गुर्दे की छानने वाली प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है, आंखों के रेटिना को क्षति पहुंचती है और रोगी सिरदर्द, थकावट और धुंधला दिखाई देना आदि से पीड़ित हो जाता है। इससे सबसे बड़ा नुकसान हृदय संस्थान और रक्तवाहिनियों को क्षति होना होता है जिससे रक्त संचार में बाधा होती है फल स्वरूप पक्षाघात (लकवा) होना या दिल का दौरा (हार्ट अटेक) होने की सम्भावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा मधुमेह के रोगी को हृदय रोग होने की शिकायत ज्यादा होती है। रक्तशर्करा की अधिकता, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता व शक्ति कम कर देती है जिससे शरीर में अनेक व्याधियां पैदा होने लगती हैं जैसे मुंह, मसूढ़े, त्वचा, पैर, फेफड़े आदि संक्रमण से ग्रस्त होना, जिससे रोगी को चोट या घाव लगने, त्वचा के कटने आदि से बचने की सलाह दी जाती है क्योंकि घाव या संक्रमण हो जाने पर ये जल्दी अच्छे नहीं हो पाते।

बचाव कैसे करें ?
इस रोग का बचाव करना, इलाज करने से ज्यादा जरूरी होता है क्योंकि बचाव करने से मधुमेह रोग से पैदा होने वाली दीर्घकालीन जटिलताओं और व्याधियों से बचा जा सकता है, रोग को बढ़ने से रोका जा सकता है। नियमित उचित पथ्य आहार लेना, अपथ्य पदार्था का सेवन न करना, नियन्त्रित व्यायाम, सुबह लम्बी सैर करना और समय-समय पर चिकित्सक से सलाह लेकर उस पर अमल करना आदि
मधुमेह के रोगी के लिए मधुर रस और मीठे पदार्था का सेवन वर्जित है फिर भी मधुरता का स्वाद बनाए रखने के लिए कृत्रिम रूप में मीठे पदार्थ उपलब्ध हैं जिनमें कुछ तो कम कैलोरी (ऊर्जा) वाले और कुछ नान कैलोरी (ऊर्जा विहीन) होते हैं तो कुछ पदार्थ कैलोरी युक्त भी होते हैं। ऊर्जा रहित मिठास होने वाले पदार्था में सेकरीन और ऊर्जा युक्त पदार्था में फ्रक्टोज और सॉरबिटॉल का नाम प्रमुख है। मधुमेह का रोगी अपने रोग व शरीर तथा स्वास्थ्य को मद्दे नजर रख कर उचित मात्रा व विधि के साथ ऐसे पदार्थो का सेवन कर सकता है फिर भी ऐसे पदार्था का सेवन करने से पहले उचित जानकारी प्राप्त कर लेना या अपने चिकित्सक से परामर्श कर लेना जरूरी है।
यह रोग नियन्त्रित तो किया जा सकता है पर जड़ से समान्य नहीं किया जा सकता इसलिए जाहिर बात है कि जीवन पर्यन्त इस रोग के साथ जीना पड़ता है। ऐसी सूरत में रोगी को यह जानकारी यानी शिक्षा प्राप्त करनी ही होगी कि सन्तुलित व नियमित आहार‑विहार क्या होता है, नियमित दिनचर्या क्या होती है, पथ्य क्या है अपथ्य क्या है, रोग होने के कारण व लक्षण क्या हैं, इन्हें नियन्त्रित कैसे किया जा सकता है, त्वचा की सुरक्षा व स्वच्छता क्यों और कैसे की जाए आदि सम्पूर्ण जानकारी प्रापत करनी होगी ताकि तदनुसार अमल करके रोग को बढ़ने से रोक सके और नियन्त्रण बनाए रख सके।
(1) भोजन में शक्कर, मीठे फल या इनका रस व शहद के स्थान पर ज्वार, गेह, बाजरा जैसे स्टार्च युक्त पदार्था का समावेश करें।
(2) सलाद में प्रयुक्त की जाने वाली सभी सब्जियां, हरी पत्तेदार शाक का भरपूर सेवन करें।
(3) सोयाबीन या चने का आटा मिले आटे की रोटी खाएं।
(4) भोजन पकाने में चिकनाई का उपयोग कम से कम करें। तले हुए पदार्था की अपेक्षा भाप से पके या उबले हुए, भुने हुए पदार्था का सेवन करें।
(5) रेशायुक्त पदार्था और चोकर मिले आटे व छिलका सहित दाल का प्रयोग करें। मैदा, छिलका सहित दाल, फल, शाक आदि का सेवन न करें।

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