लखनऊ

कानपुर में भी तेजी से नेटवर्क फैला रहा है पीएफआई

लखनऊ। सीएए और एनआरसी को लेकर विरोध‑प्रदर्शन और हिंसा भड़काने वाला संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) दिल्ली और लखनऊ के बाद कानपुर में तेजी से नेटवर्क बढ़ा रहा है। एक प्रतिबंधित संगठन के लोग इसकी मदद कर रहे हैं। दो दिन के भीतर पीएफआई के सात सक्रिय सदस्यों के पकड़े जाने के बाद पुलिस और खुफिया एजेंसियां कानपुर को लेकर अलर्ट हो गई हैं। बताया जा रहा है कि अभी भी बड़ी संख्या में संगठन के सदस्य कानपुर में मौजूद हैं।
खुफिया विभाग की रिपोर्ट के बाद पुलिस सतर्क हो गई है। पुलिस अफसरों का कहना है कि 20 और 21 दिसंबर को बाबूपुरवा और यतीमखाना में हुई हिंसा के पीछे पीएफआई का हाथ है। इसके सदस्यों ने भीड़ की भावनाओं को भड़काकर उपद्रव कराया। कुछ सीधे तौर तो कुछ पर्दे के पीछे रहकर साजिश रचते रहे। अफसरों के मुताबिक संगठन की हर गतिविधि पर नजर है।
यह पहला मौका नहीं जब संगठन ने कानपुर में अपना बेस बनाने की कोशिश की है। वर्ष 2006-07 में एक प्रतिबंधित संगठन जब अंतिम सांसें ले रहा था तब उसकी बैठक गम्मू खां हाता में हुई थी। इसके बाद संगठन नष्ट होता गया और इससे जुड़े लोग या तो चुप होकर बैठ गए या दूसरे संगठनों का साथ पकड़ लिया था। 2016–17 में पीएफआई का नाम सामने आया तो प्रतिबंधित संगठन के सक्रिय सदस्य उससे जुड़ गए। इसकी पहली बैठक भी गम्मू खां हाता में हुई थी जिसमें कई मुद्दों पर रूपरेखा तय की गई। एसआईटी के अधिकारी का कहना है कि पीएफआई के सदस्य सिर्फ सीएए का विरोध नहीं, बल्कि कई मुद्दों पर मिलाजुला गुस्सा निकालकर नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
नफरत फैलाने के लिए पीएफआई के पास फंड कहां से आ रहा है, यह सवाल पुलिस और खुफिया विभाग के लिए बड़ा है। इसके लिए देश में कुछ ऐसे उद्योगपतियों को चिह्नित किया गया है जिन पर संगठन को फंड करने का शक है। ईडी के साथ खुफिया और पुलिस भी इसी का पता लगाने में जुटी है। एजेंसी के अफसरों का मानना है कि बड़ा नेटवर्क चलाने के लिए काफी फंड की जरूरत होती है। ऐसे में उद्योगपतियों के अलावा कुछ देश के दुश्मन भी फंड एकत्र कराने में भागीदारी दे रहे होंगे, हालांकि जांच के बाद ही सब पता चल जाएगा। ‑वेब