संजीवनी

बजुर्ग पार्को में और बच्चे घर पर रहने को मजबूर

जब बच्चे का जन्म होता है तो पहले वह अपनी मां की गोद में खेलता है, उसके बाद घर के आंगन में खेलता है और फिर वह अपने मोहल्ले या कालोनी में बने पार्कों में खेलने जाता है। पार्क में उसे अपनी प्रतिभा का अहसास होता है। माता पिता को भी लगता है कि मेरा बच्चा आगे भविष्य में अच्छा खेल सकता है। इसके पश्चात वह मेहनत करके अपने जिले के स्टेडियम में खेलता है और आगे चलकर अपने देश का नाम रौशन करता है मगर अफसोस जो पार्क सरकार ने बच्चों के खेलने के लिए बनाये थे आज उन्हीं पार्कों पर बजुर्गों ने अपना अधिकार जमा लिया है। पार्कों को बाग — बगीचों में परिवर्तित कर दिया गया है और जो बच गये हैं उनको परिर्वित किया जा रहा है।
जो बच्चे देश का भविष्य हैं और अपने देश का नाम खेल जगत में रौशन करना चाहते हैं वे अपने घरों में रहने को मजबूर हो गये हैं अब उन्हें कम्प्यूटर या मोबाईल का सहारा लेना पड़ रहा है जिसका कि सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि उनकी आखों की रौशनी कमजोर होती जा रही है और वे चश्मा लगाने को मजबूर हो गये हैं। उनके स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
जरा सोचिये कि अगर सचिन तेंदुलकर, कपिल देव, सुनील गावस्कर और विराट कोहली जैसे महान खिलाड़ी मोहल्ले या कालोनियों में बने पार्कों मंे नहीं खेलते तो क्या वे आगे चलकर देश का नाम खेल जगत में रौशन कर पाते ?
सरकार एक तरफ जहां खेलों के बढ़ावे की बात करती है तो वहीं दूसरी तरफ पार्कों को बाग बगीचों में परिविर्तत करने में सहयोग कर रही है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश खेलों के मामले में सबसे ज्यादा पिछड़ गया है।
आज मोहल्लों और कालोनियों के पार्कों में पार्षद निधि से पैसा लगाकर और बजुर्गों द्वारा एक सोसायटी बनाकर हर घर से रु. 300 से रु 500 तक हर महीने एकत्रित करके व एक माली रखकर पार्कों को बाग बगीचों में परिवर्तित कर दिया गया है और नाम दे दिया गया है ’विकसित पार्क’ जहां पर सारे बुजुर्ग पुरूष व महिलाऐं सुबह शाम टहलते हैं और समूह बनाकर अपने घर की समस्याओं का हल निकालते हैं। बच्चों को यहां तक कि रबड़ की बाॅल से क्रिकेट या फुटबाल खेलने से मना कर देते हैं और उनसे लूडो, कैरमबोर्ड या बैटमिटन खेलने के लिए कहते है लेकिन इन खेलों से फिजिकल एक्टिविटीज (शारीरिक व्यायाम) नहीं हो पाता है।
यहां हमारा ये तात्पर्य नहीं है कि बजुर्ग पुरुष या महिलायें न टहलेें या न बैठें अपितु मैं यह कहना चाहता हूं कि पार्क का डिजाईन ऐसा होना चाहिए जिसमें पुरुष व महिलाओं के टहलने के स्थान के साथ‑साथ बच्चों के भी खेलने का स्थान हो। पार्क के चारों तरफ किनारे टहलने के लिए ट्रैक या फटपाथ हो, पेड़ पौधे हों और बीच में खुला मैदान हो जहां बच्चे यदि खेलना चाहें तो खेल सकें लेकिन अफसोस बीच में या तो वाटर फाऊनटेन बना दिया गया है (जो अब चलाया ही नहीं जाता है), पेड़‑पौधे लगा दिए गये हैं और टहलने के लिए ट्रैक बना कर पार्क को बर्बाद कर दिया गया है। कुछ पार्कों में तो मंदिर के साथ‑साथ रहने के लिए कमरे तक बना कर कब्जा कर लिया गया है, जिसमें माली स्वयं तो रहते ही हैं साथ में अपने रिश्तेदारों को भी रहने के लिए बुला लेते हैं। — संपादक, योगेश कपूर

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