देश

भयभीत और असमंजस में केन्द्र सरकार

संसद का बजट सत्र 29 जनवरी से शुरू होने वाला है। विपक्ष की पूरी तैयारी है कि सरकार को कृषि कानूनों और दिल्ली की सीमाओं पर जारी प्रदर्शन को लेकर घेर लिया जाए। राष्ट्रीय दलों से लेकर क्षेत्रीय क्षत्रपों ने खुलकर किसान आंदोलन को अपना समर्थन दिया है, ऐसे में बीजेपी संसद में अलग-थलग पड़ सकती है। भले ही आंकड़े मोदी सरकार के पक्ष में हो, लेकिन बीजेपी नहीं चाहेगी कि छोटे-छोटे दल भी एकजुट होकर कोई समूह बना लें।
सरकार नहीं चाहती कि गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में किसान ट्रैक्टर रैली निकालें। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से रैली रुकवाने की गुहार लगाई थी मगर कोर्ट ने कहा कि इसपर फैसला उसी (पुलिस) को करना है। अगर ट्रैक्टर परेड निकलती है तो यह सरकार के लिए बड़ी शर्मिंदगी की बात होगी। ऐसा हुआ तो किसानों की रैली गणतंत्र दिवस परेड को ओवरशैडो कर जाएगी। केंद्र सरकार ऐसा कभी नहीं चाहेगी।
12 जनवरी को अपने अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों नए कानूनों को लागू किए जाने पर रोक लगा दी थी। ऐसा कम ही होता है जब संसद से पास कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगाए। सरकार को इसकी उम्मीद नहीं थी। जब कोर्ट ने एक एक्सपर्ट कमिटी बनाई तो सरकार को लगा कि यह इन विरोध‑प्रदर्शनों को खत्म करने का एक रास्ता हो सकता है। हालांकि कई नेताओं ने से इसे ’न्यायिक सीमा का अतिक्रमण’ करार दिया है।
किसान आंदोलन को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी बीच‑बीच में राय रखता रहा। खबरें आईं कि जिस तरह सरकार किसान आंदोलन को हैंडल कर रही है, उससे आरएसएस खुश नहीं। द इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा था कि ’एक मिडल ग्राउंड खोजने की जरूरत है और दोनों पक्षों को हल निकालने की दिशा में काम करना चाहिए।’ जोशी का कहना था कि किसी भी प्रदर्शन का लंबे वक्त तक चलना समाज के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। यह एक तरह से बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार को संदेश था कि संघ इन सबसे खुश नहीं है। ‑वेब

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